
विकास और हम
विकास तो बना हुआ है,
सामन्तवादी परिपाटी,
आजादी मिली मगर,
दीवार अभी ना पाटी ।
ब्लैक कीै मदिरा पीने वाले,
राशन का ढूंढे सस्ता गल्ला,
बी पी एल कार्ड जेब डाले,
घूमता बढे घर का निठल्ला।
ऊंच नीच की बढती खाई,
नेताजी के वोट का हल्ला,
जनता तो बस घूम रही,
डाल गले में मोटा छल्ला ।
भुखमरी से होती मौतें,
झाङ रहे नेता जी पल्ला,
उङानें पीढी दर पीढी,
इस पर न अपना हक भोला,
हम तो गड्ढों भरी सङक पर,
ले रहे जमकर हिचकोला,
कुछ हङतालों, जलसों तक,
सिमट गई अपनी आजादी,
कागज पर हल्ला है ,
हो रही लोकतन्त्र की बरबादी,
आजादी के मतवाले देख रहे स्वर्ग से,
समरसता की यह बुझती बाती,
तथाकथित अपने कामरेड पीट रहे झूठी छाती।
गोकुल कोठारी
