March 06, 2026 0Comment

हास्य-व्यंग्य की दुनिया का एक सशक्त नाम : गौरव त्रिपाठी

यह कहानी है हास्य कवि एवं व्यंग्यकार गौरव त्रिपाठी की। उनका जन्म वर्ष 1985 में उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में हुआ। बचपन से ही उन्हें किताबें पढ़ने का काफी शौक था। यही रुचि आगे चलकर उनके व्यक्तित्व और लेखन की आधारशिला बनी।

गौरव त्रिपाठी ने हाईस्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्होंने इंटरमीडिएट और बीएससी की पढ़ाई भी शाहजहांपुर से ही पूरी की। पिता की प्रेरणा से उन्होंने पत्रकारिता को अपना कार्यक्षेत्र चुना। इसी उद्देश्य से उन्होंने बरेली कॉलेज से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया और आगे की पढ़ाई के लिए रायपुर, छत्तीसगढ़ चले गए।

रायपुर में उन्होंने कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय से मास्टर ऑफ जर्नलिज्म की डिग्री कांस्य पदक के साथ प्राप्त की। पढ़ाई के उन दो वर्षों के दौरान उनका रुझान गद्य व्यंग्य साहित्य की ओर तेजी से बढ़ने लगा। इसी समय उनके कई व्यंग्य लेख वहां की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगे।

शिक्षा पूरी करने के बाद वे नौकरी की तलाश में उत्तराखंड के हल्द्वानी शहर पहुंचे, जहां उन्होंने अमर उजाला समाचार पत्र से अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत की। हल्द्वानी में रहते हुए भी साहित्य के प्रति उनका प्रेम कम नहीं हुआ और उन्होंने लगातार लेखन जारी रखा।

हल्द्वानी में साहित्यिक आयोजनों की कमी के कारण उन्होंने दिल्ली की ओर रुख किया। वहां उन्हें वरिष्ठ साहित्यकारों का स्नेह और मार्गदर्शन मिला। इसी क्रम में उन्हें साहित्य अकादमी, हिंदी अकादमी और विश्व पुस्तक मेले जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर मिला। इसके अलावा कोटा (राजस्थान), जमशेदपुर (झारखंड) और डलहौजी (हिमाचल प्रदेश) में आयोजित साहित्यिक कार्यक्रमों में भी उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। उन्हें दक्षिण चीन के हांगकांग और मकाऊ जाने का अवसर भी प्राप्त हुआ।

इस दौरान उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं, जिनमें “पैकेज का पपलू”, “दोराहे पर जिंदगी”, “कपूत” और “दामोदर दा” विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। हास्य-व्यंग्य के प्रति उनकी साधना को देखते हुए उन्हें व्यंग्यकारों की आठवीं पीढ़ी के प्रतिनिधि लेखक के रूप में भी पहचाना गया। इतना ही नहीं, हल्द्वानी के एमबीपीजी कॉलेज की दो छात्राओं ने उनकी पुस्तकों पर शोध कार्य भी किया।

पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण गौरव त्रिपाठी ने बाहरी कार्यक्रमों से कुछ दूरी बनाकर स्थानीय स्तर पर साहित्य को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। इसी दौरान उन्होंने गद्य से आगे बढ़कर कविता को भी अपने अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया और हल्द्वानी में होने वाले कवि सम्मेलनों में सक्रिय रूप से भाग लेने लगे। उन्हें रामपुर आकाशवाणी में रिकॉर्डिंग के लिए भी कई बार आमंत्रित किया गया।

हल्द्वानी में साहित्य के गिरते स्तर को देखते हुए उन्होंने “हरफनमौला साहित्यिक संस्था” की स्थापना की। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने कई बड़े कवि सम्मेलनों का सफल आयोजन किया। उनका मानना है कि साहित्य को जीवित रखने के लिए उसे जमीनी स्तर तक पहुंचाना जरूरी है।

इसी सोच के साथ उन्होंने स्कूलों में जाकर बच्चों को कविता और साहित्य से जोड़ने की मुहिम शुरू की। वर्तमान में वे कुमाऊं क्षेत्र के 50 से अधिक स्कूलों में प्रतिवर्ष कवि सम्मेलन आयोजित कर बच्चों को साहित्य से जोड़ने का सराहनीय कार्य कर रहे हैं।

बच्चों में साहित्यिक रुचि बढ़ाने के उद्देश्य से उनके द्वारा संपादित बाल काव्य संग्रह—
“बच्चे ऑनलाइन हैं”, “पप्पू बैठा परीक्षा में” और “टॉपर टनाटन”—ने विशेष सुर्खियां बटोरी हैं।

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